***********ग़ज़ल***********
दोस्त भी क्या खूब वाफाओ का सिला देते हैं
हर मोड़ पे एक ज़ख्म नया देते हैं
तुमसे तो खैर घड़ी भर की मुलाक़ात रही
लोग तो सदियों की रफाक़त भुला देते हैं
कैसे मुमकिन हैं धुंआ भी न हो और दिल भी जले
चोट लगती है तो पत्थर भी सदा देते हैं
कौन होता है मुसीबत में किसी का ऐ dost
आग लगती है तो पत्ते भी हवा देते हैं
जिनपे होता है दिल को बहुत भरोसा "ताबिश"
वक्त पड़ने पे वही लोग दगा देते हैं
bahut khoob !
ReplyDeleteतुमसे तो खैर घड़ी भर की मुलाक़ात रही
ReplyDeleteलोग तो सदियों की रफाक़त भुला देते हैं
कैसे मुमकिन हैं धुंआ भी न हो और दिल भी जले
चोट लगती है तो पत्थर भी सदा देते हैं
बेहतरीन शेर
लाजवाब गजल
शुभकामनायें
आज की आवाज
कृपया वर्ड वैरिफिकेशन की उबाऊ प्रक्रिया हटा दें ! इसकी वजह से प्रतिक्रिया देने में अनावश्यक परेशानी होती है !
ReplyDeleteतरीका :-
डेशबोर्ड > सेटिंग > कमेंट्स > शो वर्ड वैरिफिकेशन फार कमेंट्स > सेलेक्ट नो > सेव सेटिंग्स
कैसे मुमकिन हैं धुंआ भी न हो और दिल भी जले
ReplyDeleteचोट लगती है तो पत्थर भी सदा देते हैं..
वाह वाह बहुत सुन्दर ..,क्या बात कहि है ...
दिल-नाज़ुक पे उसके रहम आता है मुझे'गा़लिब'
न के सरगर्म उस क़ाफ़िर को उल्फत आजमाने में .. मक्
sahi bat hai. narayan narayan
ReplyDeletealbele kharti ji, prakash govind, mast kanaldar, narad muni , sangeetapuri ji.......... aap sabhi ka tahey dil se shukriya ki aapne mere sangrah ko pasand kiya,
ReplyDeletekoshish karunga ki jald se jald blog ko update karta rahoon