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Friday, June 12, 2009

आज इस दौर में......

आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंजर क्यों है

ज़ख्म हर सर पे हर हाथ में पत्थर क्यों है...

जब हकीक़त है की हर ज़र्रे में तू रहता है

फ़िर ज़मीन pe कहीं मस्जिद कहीं मन्दिर क्यों है

अपना अंजाम तो मालूम है सबको फ़िर भी

अपनी नजरो में हर इंसान सिकंदर क्यों है

ज़िन्दगी अब जीने के काबिल ही नही अब मेरे दोस्त

देखो हर आँख अश्को का समंदर क्यों है

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