हुस्न बाज़ार हुआ कि हुनर ख़त्म हुआ..
आया पलकों पे तो आंसुओं का सफर ख़त्म हुआ॥
मेरे सच ने ही अकेला कर के छोड़ा मुझे
रफ्ता-रफ्ता लोगों पे मेरा असर ख़त्म हुआ ॥
ज़िन्दगी तुने अजब ज़ंग का मैदान दिया
मैं न जिंदा ही बचा और न डर ख़त्म हुआ ॥
उम्र भर तुझसे बिछड़ने की कसक ही न गयी
कौन कहता है मुहब्बत का असर ख़त्म हुआ॥
नई कालोनी में बच्चो की ज़िदें ले गई
बाप-दादा का बनाया हुआ घर ख़त्म हुआ॥
जा हमेशा ko छोड़ कर जाने वाले मुझको
tujhse हर लम्हा बिछड़ने का डर ख़त्म हुआ॥
एक अच्छी गजल पढ़वाने के लिए धन्यवाद
ReplyDeleteवीनस केसरी