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Thursday, June 4, 2009

कभी मैं आलम ऐ इमकान से गुज़र जाता हूँ

और कभी जिस्म के दलदल में उतर जाता हूँ

ये मेरा शहर कभी मुझमे सिमट जाता है

कभी मैं शहर की हर शय में बिखर जाता हूँ

शहर से रहती है एक ज़ंग मुसलसल दिन भर

शहर जब हांफने लगता है तो घर जाता हूँ

इस कश ओ कश में ही मिलता निशान होने का

जब भी तकमील का एहसास हो मर जाता हूँ

ले उडी रौशनी ही जुर्रत ऐ बीनाई मेरी

अब तो मैं दिन के ujale से ही डर जाता हूँ

हर एक आँख में अपनी ही कहानी देखूं

अपना चेहरा नज़र आता है जिधर जाता हूँ

शहर सजते हैं गुजार्गाहे चमक jati हैं

अपने ही खून में डूबूं तो ये संवर जाता हूँ

खु;ता ही नही मौत का हंगामा है क्या

वक्त रुक जाता है या मैं hi ठहर जाता हूँ

कभी मैं आलाम ऐ इनकान से गुजर जाता हूँ ...

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