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Sunday, June 14, 2009

&&&&&&&& ग़ज़ल &&&&&&&&

तेरी खुशबू नही मिलती तेरा चेहरा नही मिलता
हमें तो शहर में कोई तेरे जैसा नही मिलता

ये कैसी धुंद में हम सफर का आगाज़ बैठे
तुम्हे आँखे नही मिलती हमें चेहरा नही milta


कर एक तदबीर अपनी राएगा ठहरी मुहब्बत
kisi भी ख्याब को ताबीर का रास्ता नही मिलाता

ज़माने को करीने से वो अपने साथ रखता है
मगर मेरे लिए उसको कोई लम्हा नही मिलता

मुसफत में दुआ-ऐ-अब्र उन का साथ देती है
जिन्हें सहरा के दमन में कोई दरिया नही मिलता

जहाँ ज़ुल्मत रगों में अपने पंजे gaarh देती है
उसे तरीक रास्तो पे दिया जलता नही milta

Saturday, June 13, 2009

ग़ज़ल

शिकवा हो या शिकायत मुझसे मेरे बाद तुम करोगे
याद आते हैं हम बहुत मेरे बाद तुम कहोगे
कई सवाल कई बातें होंगी सिर्फ़ मेरे खातिर
बेहद मुझसे प्यार मेरे बाद तुम करोगे
नही आ सकूंगा फ़िर कभी जो गया दूर तुमसे
हर घड़ी मेरा इन्तिज़ार तुम करोगे
अभी पास हूँ तो मेरा ख्याल तक नहीं तुम्हे
रो-रो कर गलतियों का इज़हार तुम karoge

Friday, June 12, 2009

कोई बहुत रोया

एक लफ्ज़ तसल्ली का ; एक लफ्ज़ मोहब्बत का
ख़ुद अपने लिए उसने लिखा तो बहुत रोया
पहले भी शिकस्तों से खायी थी शिकस्त उसने
लेकिन वो तेरे हाथो हारा तो बहुत रोया
इतना आसान न था हस्ती से गुज़र जाना
उतरा जो समंदर में तो दरिया बहुत रोया
जो शख्स न रोया कभी तपती हुई राहों में
दिवार के साये में बैठा तो बहुत रोया

कुछ रहने दो

मेरे दमन को गमो से ही भरा रहने दो
कुछ देर और इन ज़ख्मो को हरा रहने दो
ये तहरीर और तस्वीर भले ही ले जाओ
अपनी बातें ; अपनी यादें को मेरा रहने दो
अगर ये सच की तुम पास नही हो मेरे
तो मेरे ख्याबो को हकीक़त से जुदा रहने दो
ये रौशनी के उजाले हो मुबारक तुमको
मुझे दरमियाँ अंधेरो के पड़ा रहन do
आएगा वो अभी मुझे अलविदा कहने
तुम मेरे कफ़न को कुछ देर खुला रहने दो

आज इस दौर में......

आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंजर क्यों है

ज़ख्म हर सर पे हर हाथ में पत्थर क्यों है...

जब हकीक़त है की हर ज़र्रे में तू रहता है

फ़िर ज़मीन pe कहीं मस्जिद कहीं मन्दिर क्यों है

अपना अंजाम तो मालूम है सबको फ़िर भी

अपनी नजरो में हर इंसान सिकंदर क्यों है

ज़िन्दगी अब जीने के काबिल ही नही अब मेरे दोस्त

देखो हर आँख अश्को का समंदर क्यों है

ग़ज़ल लेखक._?

तेरे दिल की गहराइयों स्निकल गया हूँ मै
शायद इसी वजह से इतना बदल गया हूँ

meri रौशनी से कायम थी तेरी बज्म की रौनक
मगर अब यूँ लगता है जैसे ढल गया हूँ

फ़िर न होगा प्यार में कमी का एहसास तुझको
तुने नजरो से गिराया तो संभल गया हूँ

Sunday, June 7, 2009

हुस्न बाज़ार हुआ कि हुनर ख़त्म हुआ..
आया पलकों पे तो आंसुओं का सफर ख़त्म हुआ॥

मेरे सच ने ही अकेला कर के छोड़ा मुझे
रफ्ता-रफ्ता लोगों पे मेरा असर ख़त्म हुआ ॥

ज़िन्दगी तुने अजब ज़ंग का मैदान दिया
मैं न जिंदा ही बचा और न डर ख़त्म हुआ ॥

उम्र भर तुझसे बिछड़ने की कसक ही न गयी
कौन कहता है मुहब्बत का असर ख़त्म हुआ॥

नई कालोनी में बच्चो की ज़िदें ले गई
बाप-दादा का बनाया हुआ घर ख़त्म हुआ॥

जा हमेशा ko छोड़ कर जाने वाले मुझको
tujhse हर लम्हा बिछड़ने का डर ख़त्म हुआ॥

Friday, June 5, 2009

***********ग़ज़ल***********

दोस्त भी क्या खूब वाफाओ का सिला देते हैं

हर मोड़ पे एक ज़ख्म नया देते हैं

तुमसे तो खैर घड़ी भर की मुलाक़ात रही

लोग तो सदियों की रफाक़त भुला देते हैं

कैसे मुमकिन हैं धुंआ भी न हो और दिल भी जले

चोट लगती है तो पत्थर भी सदा देते हैं

कौन होता है मुसीबत में किसी का ऐ dost

आग लगती है तो पत्ते भी हवा देते हैं

जिनपे होता है दिल को बहुत भरोसा "ताबिश"

वक्त पड़ने पे वही लोग दगा देते हैं

ग़ज़ल

***इक्र ऐ शब् ऐ फिराक से वहशत उसे भी थी***

मेरी तरह किसी से मोहब्बत दस भी थी

***मुझको भी शौक़ था नए चेहरों के दीद का***

रास्ता बदल के चलने की आदत उसे भी थी

***मुझसे बिछ्ढ़ के शहर में घुल मिल गया वो***

हालां की शहर भर से रक़ाबत उसे भी थी

***वो मुझसे भी बढ़कर ज़ब्त का आदी था, जी गया ***

वरना हर एक साँस क़यामत उसे भी थी....

Thursday, June 4, 2009

कभी मैं आलम ऐ इमकान से गुज़र जाता हूँ

और कभी जिस्म के दलदल में उतर जाता हूँ

ये मेरा शहर कभी मुझमे सिमट जाता है

कभी मैं शहर की हर शय में बिखर जाता हूँ

शहर से रहती है एक ज़ंग मुसलसल दिन भर

शहर जब हांफने लगता है तो घर जाता हूँ

इस कश ओ कश में ही मिलता निशान होने का

जब भी तकमील का एहसास हो मर जाता हूँ

ले उडी रौशनी ही जुर्रत ऐ बीनाई मेरी

अब तो मैं दिन के ujale से ही डर जाता हूँ

हर एक आँख में अपनी ही कहानी देखूं

अपना चेहरा नज़र आता है जिधर जाता हूँ

शहर सजते हैं गुजार्गाहे चमक jati हैं

अपने ही खून में डूबूं तो ये संवर जाता हूँ

खु;ता ही नही मौत का हंगामा है क्या

वक्त रुक जाता है या मैं hi ठहर जाता हूँ

कभी मैं आलाम ऐ इनकान से गुजर जाता हूँ ...

कैसे गुजरी क़यामत की वो रात न पूछो
था उनका मेरे होठो में हाथ न पूछो ॥
चल रही थी धड़कने पर रुकी हुयी थी सांसे 
मदहोशी में हुयी वो करामात न पूछो ॥
अनजाने थे वो हम थे नादाँ से
कैसे हुए ज़ाहिर दोनों के जज़्बात न पूछो ॥
छू ले उन्हें या करे थोड़ा इंतज़ार
बेखुद से हो गए हमारे ख़यालात न पूछो ॥
सीने से लग के pigहलने लगे थे वो
उनकी निगाह ने किए क्या क्या सवालात न पूछो ..
खुदा का रहें था या था मेरे इश्क का असर
किस तरह हुयी हासिल ये सौगात न पूछो ॥
कैसे गुजरी क़यामत की वो रात न पूछो ............
था उनका मेरे हाथो में हाथ न पूछो..................

Tuesday, June 2, 2009

कोई लम्हा भी कभी लौट कर नही आया
वो शख्स ऐसा गया फ़िर नही आया

वफ़ा के दस्त में रास्ता नही मिला कोई
सिवाए गर्द-ऐ-सफर हमसफ़र नही मिला

किसी चिराग ने नही पूछी ख़बर मेरी
कोई भी फूल मेरे नाम पर नही आया

पलट के आने लगे शाम को परिंदे भी
हमारा सुबह का भूला मगर नही आया

कैसे यकीन करे " अमजद " वो वादा ख़िलाफ़
ये उम्र कैसे कटेगी अगर नही आया