Pages

Friday, June 4, 2010

ग़म-ऐ-दिल सुनाने को जी चाहता है
उन्हें आजमाने को जी चाहता है

सुना है जबसे बहूत दूर हो तुम
बहूत दूर जाने को जी चाहता है

उन्हें हमसे कोई शिकायत नहीं है
यूं ही रूठ जाने को जी चाहता है

फ़क़त है यही उनकी नजरो का धोका
कहा धोके में आने को जी चाहता है

दुआ है हमसे वो सौ बार रूठे
हर बार उन्हें मानाने को जी चाहता है

नज़र वो न आये पर उनकी गली में
यूं ही आने जाने को जी चाहता है

No comments:

Post a Comment