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Friday, January 22, 2010

मेरी अपनी ग़ज़ल

जाने क्यों ऐसा लगता है मुझको
ज़िन्दगी तेरे बिन भी चल रही है
जैसे साल का आखिरी सूरज
ज़िन्दगी ऐसे ही ढल रही है
तबस्सुम के हर रूप में ख़ामोशी
ऐसे कई सवाल कर हल रही है
कलम ने स्याही संग की है बहुत मेहनत
शायरी मेरी कागजो पे हाथ मल रही है
ज़रूरी नहीं है बाग़ में बाघबान का होना
फूलो की ज़िन्दगी तो काँटों पे चल रही है
मेरी छोटी सी कोशिश है ये की शायरी मेरी आपको पसंद आये
आपके जवाब का तलबगार.... islam

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