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Friday, January 22, 2010

मेरी अपनी ग़ज़ल

जाने क्यों ऐसा लगता है मुझको
ज़िन्दगी तेरे बिन भी चल रही है
जैसे साल का आखिरी सूरज
ज़िन्दगी ऐसे ही ढल रही है
तबस्सुम के हर रूप में ख़ामोशी
ऐसे कई सवाल कर हल रही है
कलम ने स्याही संग की है बहुत मेहनत
शायरी मेरी कागजो पे हाथ मल रही है
ज़रूरी नहीं है बाग़ में बाघबान का होना
फूलो की ज़िन्दगी तो काँटों पे चल रही है
मेरी छोटी सी कोशिश है ये की शायरी मेरी आपको पसंद आये
आपके जवाब का तलबगार.... islam

Sunday, June 14, 2009

&&&&&&&& ग़ज़ल &&&&&&&&

तेरी खुशबू नही मिलती तेरा चेहरा नही मिलता
हमें तो शहर में कोई तेरे जैसा नही मिलता

ये कैसी धुंद में हम सफर का आगाज़ बैठे
तुम्हे आँखे नही मिलती हमें चेहरा नही milta


कर एक तदबीर अपनी राएगा ठहरी मुहब्बत
kisi भी ख्याब को ताबीर का रास्ता नही मिलाता

ज़माने को करीने से वो अपने साथ रखता है
मगर मेरे लिए उसको कोई लम्हा नही मिलता

मुसफत में दुआ-ऐ-अब्र उन का साथ देती है
जिन्हें सहरा के दमन में कोई दरिया नही मिलता

जहाँ ज़ुल्मत रगों में अपने पंजे gaarh देती है
उसे तरीक रास्तो पे दिया जलता नही milta

Saturday, June 13, 2009

ग़ज़ल

शिकवा हो या शिकायत मुझसे मेरे बाद तुम करोगे
याद आते हैं हम बहुत मेरे बाद तुम कहोगे
कई सवाल कई बातें होंगी सिर्फ़ मेरे खातिर
बेहद मुझसे प्यार मेरे बाद तुम करोगे
नही आ सकूंगा फ़िर कभी जो गया दूर तुमसे
हर घड़ी मेरा इन्तिज़ार तुम करोगे
अभी पास हूँ तो मेरा ख्याल तक नहीं तुम्हे
रो-रो कर गलतियों का इज़हार तुम karoge

Friday, June 12, 2009

कोई बहुत रोया

एक लफ्ज़ तसल्ली का ; एक लफ्ज़ मोहब्बत का
ख़ुद अपने लिए उसने लिखा तो बहुत रोया
पहले भी शिकस्तों से खायी थी शिकस्त उसने
लेकिन वो तेरे हाथो हारा तो बहुत रोया
इतना आसान न था हस्ती से गुज़र जाना
उतरा जो समंदर में तो दरिया बहुत रोया
जो शख्स न रोया कभी तपती हुई राहों में
दिवार के साये में बैठा तो बहुत रोया

कुछ रहने दो

मेरे दमन को गमो से ही भरा रहने दो
कुछ देर और इन ज़ख्मो को हरा रहने दो
ये तहरीर और तस्वीर भले ही ले जाओ
अपनी बातें ; अपनी यादें को मेरा रहने दो
अगर ये सच की तुम पास नही हो मेरे
तो मेरे ख्याबो को हकीक़त से जुदा रहने दो
ये रौशनी के उजाले हो मुबारक तुमको
मुझे दरमियाँ अंधेरो के पड़ा रहन do
आएगा वो अभी मुझे अलविदा कहने
तुम मेरे कफ़न को कुछ देर खुला रहने दो

आज इस दौर में......

आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंजर क्यों है

ज़ख्म हर सर पे हर हाथ में पत्थर क्यों है...

जब हकीक़त है की हर ज़र्रे में तू रहता है

फ़िर ज़मीन pe कहीं मस्जिद कहीं मन्दिर क्यों है

अपना अंजाम तो मालूम है सबको फ़िर भी

अपनी नजरो में हर इंसान सिकंदर क्यों है

ज़िन्दगी अब जीने के काबिल ही नही अब मेरे दोस्त

देखो हर आँख अश्को का समंदर क्यों है

ग़ज़ल लेखक._?

तेरे दिल की गहराइयों स्निकल गया हूँ मै
शायद इसी वजह से इतना बदल गया हूँ

meri रौशनी से कायम थी तेरी बज्म की रौनक
मगर अब यूँ लगता है जैसे ढल गया हूँ

फ़िर न होगा प्यार में कमी का एहसास तुझको
तुने नजरो से गिराया तो संभल गया हूँ